भाकृअनुप-विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा में 52वें कृषि विज्ञान मेले का आयोजन

*भाकृअनुप-विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा में 52वें कृषि विज्ञान मेले का आयोजन*

– “खेती में नवीनता, पोषण में श्रेष्ठता” थीम पर आयोजित इस मेले में प्रदेशभर से 1500 से अधिक किसानों और उत्पादक संगठनों ने प्रतिभाग किया

– मेले में विभिन्न जनपदों के किसानों ने विकास प्रदर्शनी लगाई, वहीं वैज्ञानिकों द्वारा विकसित आधुनिक कृषि तकनीकों और उन्नत उपकरणों की जानकारी भी दी गई।

उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के हवालबाग स्थित विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान में 52वें कृषि विज्ञान मेले का आयोजन किया गया। “खेती में नवीनता, पोषण में श्रेष्ठता” थीम पर आयोजित इस मेले में प्रदेशभर से 1500 से अधिक किसानों और उत्पादक संगठनों ने प्रतिभाग किया।

इस वर्ष का मेला संस्थान के गौरवशाली इतिहास में एक और महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुआ, जहाँ पर्वतीय कृषि की आधुनिकतम तकनीकों और शोध परिणामों को सीधे किसानों तक पहुँचाने का प्रयास किया गया। कार्यक्रम का शुभारम्भ राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम तदुपरान्त‍ परिषद गीत से हुआ जिसने कृषि विज्ञान मेले के माहौल को गरिमामय बना दिया। कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि डॉ. मांगी लाल जाट, माननीय सचिव, कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग, भारत सरकार एवं महानिदेशक, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली द्वारा किया गया। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथियों के रूप में डॉ. देवेन्द्र कुमार यादव, माननीय उप महानिदेशक (फसल विज्ञान) और डॉ. राजबीर सिंह, माननीय उप महानिदेशक (कृषि विस्तार), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली उपस्थित रहे। इनके अतिरिक्त डॉ. यशपाल सिंह मलिक, संयुक्त निदेशक, मुक्तेश्वर परिसर, भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान, मुक्तेश्वर एवं डॉ. अमित पांडे, निदेशक, शीतजल मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान, भीमताल ने मेले में प्रतिभाग किया।

मेले की गतिविधियों का औपचारिक आरंभ कृषकों के प्रक्षेत्र भ्रमण के साथ हुआ, जिसमें विभिन्न क्षेत्रों से आए किसानों ने संस्थान द्वारा विकसित की जा रही उन्नत फसलों और नवीन कृषि तकनीकों का प्रत्यक्ष अवलोकन किया। मुख्य अतिथि के आगमन के पश्चात माल्यार्पण और वृक्षारोपण का कार्यक्रम किया गया, जो पर्यावरण संरक्षण के प्रति संस्थान की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण आकर्षण ‘शताब्दी महिला छात्रावास’ का शिलान्यास रहा, जिसे मुख्य अतिथि द्वारा संपन्न किया गया। इसके उपरांत कृषि विज्ञान मेले का विधिवत उद्घाटन और प्रदर्शनी स्टालों का भ्रमण किया गया, जहाँ मुख्य अतिथि और अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने वैज्ञानिकों से नवीनतम शोधों पर चर्चा की।

संस्थान के निदेशक डॉ. लक्ष्मी कान्त ने अपने स्वागत भाषण में सभी अतिथियों और कृषकों का अभिनंदन करते हुए संस्थान की उपलब्धियों और पर्वतीय किसानों के कल्याण हेतु किए जा रहे प्रयासों का विवरण प्रस्तुत किया। उन्होंने अपने संबोधन में संस्थान की शताब्दी यात्रा और पर्वतीय कृषि में इसके योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि संस्थान अब तक 200 से अधिक उन्नत प्रजातियां विकसित कर चुका है जिसमें उनके द्वारा विशेष रूप से बायोफोर्टिफाइड मक्का की किस्मों ‘वी.एल. त्रिपोषी’ और ‘वी.एल. सुपोषिता’ की सफलता का उल्लेख किया जो पोषण सुरक्षा की दृष्टि से मील का पत्थर हैं। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि संस्थान ने उर्वरकों की खपत कम करने हेतु विशेष बैक्टीरिया खोजा है और मडुवा ट्रांसप्लांटर जैसे यंत्रों से खेती को सुगम बनाया है। उन्होंने अपने वक्तव्य में यह भी कहा कि हींग और किनोआ जैसी नई फसलों पर किए जा रहे प्रयोगों को भविष्य की आय का साधन बताया गया। डॉ. कान्त ने मशरूम उत्पादन और मौनपालन के माध्यम से किसानों की आय कई गुना बढ़ाने के सफल उदाहरण भी साझा किए। उन्होंने गर्व के साथ बताया कि इस मेले में चीन सीमा से सटे सुदूर गांवों के किसानों सहित कुल 1129 कृषकों ने पंजीकरण कराया है। डिजिटल माध्यमों और आकाशवाणी के जरिए कृषि सूचनाओं के प्रसार की रणनीति पर भी उन्होंने बल दिया।

मुख्य अतिथि डॉ. मांगी लाल जाट, माननीय सचिव, कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग, भारत सरकार एवं महानिदेशक, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली ने संस्थान के 100 वर्षों के गौरवशाली इतिहास और नई प्रजातियों के विकास की उपलब्धि के लिए वैज्ञानिकों को बधाई दी। उन्होंने विशेष रूप से ‘वी.एल. त्रिपोषी’ और ‘सुपोषिता’ जैसी बायोफोर्टिफाइड मक्का किस्मों को पोषण सुरक्षा की दिशा में क्रांतिकारी कदम बताया। उनके अनुसार, उर्वरकों की बचत करने वाले बैक्टीरिया और आधुनिक यंत्रों का विकास ‘कम लागत, अधिक उत्पादन’ के लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायक होगा। उन्होंने अपने संबोधन में उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग से मृदा स्वास्थ्य और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों के प्रति सचेत किया और आगामी खरीफ सीजन से पूर्व देशभर में, विशेषकर अत्यधिक उर्वरक खपत वाले जिलों में, ‘उर्वरकों के संतुलित उपयोग पर गहन अभियान’ का शुभारम्भ किया। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य मृदा परीक्षण आधारित पोषक तत्व प्रबंधन, एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन और जैविक खादों के उपयोग को बढ़ावा देना है। डॉ. जाट ने इस बात पर विशेष बल दिया कि मशरूम, मौनपालन और पॉलीहाउस जैसी तकनीकों को अपनाकर किसान अपनी आय को दोगुना से भी अधिक बढ़ा सकते हैं। उन्होंने सीमावर्ती क्षेत्रों के किसानों की मेले में भागीदारी को ‘लैब टू लैंड’ कार्यक्रम की एक बड़ी सफलता करार दिया। डॉ. जाट ने आह्वान किया कि पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन रोकने के लिए आधुनिक कृषि तकनीकों का प्रसार ही एकमात्र प्रभावी रास्ता है। उन्होंने संस्थान के प्रयासों की सराहना करते हुए भविष्य में डिजिटल कृषि और नवीन फसलों जैसे हींग और किनोआ पर शोध जारी रखने का सुझाव दिया। अंत में, उन्होंने वैज्ञानिकों और किसानों के साझा प्रयासों को संस्थान की वास्तविक शक्ति बताते हुए सभी का आभार व्यक्त किया एवं युवाओं से खेती को एक व्यवसाय के रूप में अपनाने की अपील की ताकि पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन को रोका जा सके।

डॉ. राजबीर सिंह, माननीय उप महानिदेशक (कृषि विस्तार), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली ने अपने संबोधन में पर्वतीय कृषि के विकास में विस्तार शिक्षा और तकनीकी हस्तांतरण की महत्वपूर्ण भूमिका पर बल दिया। उन्होंने संस्थान द्वारा विकसित तकनीकों की सराहना करते हुए पर्वतीय कृ‍षकों से कीवी, लैमन ग्रास, मसाले इत्यादि फसलों की खेती करने पर बल दिया और कहा कि ये नवाचार किसानों की जमीनी समस्याओं का वास्तविक समाधान हैं। उनके अनुसार, कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से नई प्रजातियों को सुदूरवर्ती क्षेत्रों तक पहुँचाना संस्थान की एक बड़ी उपलब्धि है। उन्होंने कृषक समुदायों, विशेषकर महिला किसानों के सशक्तिकरण हेतु श्रम में कमी लाने वाले कृषि यंत्रों के उपयोग को बढ़ाने की आवश्यकता जताई। डॉ. सिंह ने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के जरिए किसानों को बाजार से जोड़ने और उनके उत्पादों के उचित मूल्य दिलाने के प्रयासों पर भी चर्चा की। उन्होंने अपने सम्बोधन में जलवायु परिवर्तन के दौर में टिकाऊ खेती और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर भी विशेष ध्यान दिया।

प्रगतिशील किसानों का सम्मान कार्यक्रम अत्यन्त हृदयस्पर्शी रहा, जहाँ उनकी कड़ी मेहनत और नवीन तकनीकों को अपनाने के उनके जज्बे को सराहा गया। सम्मानित किसानों ने अपनी प्रतिक्रिया साझा करते हुए बताया कि किस प्रकार संस्थान की तकनीकों ने उनकी आय और जीवन स्तर में सुधार किया है। मेले के दौरान प्रगतिशील किसान श्रीमती मंजू देवी, श्री सरदार सिंह, श्री चन्दन सिंह, श्री संतोष कुमार, श्रीमती चम्पा देवी, श्री लाल सिंह कठायत, श्रीमती हेमा देवी, श्री खीम सिंह, श्री श्याम सिंह, श्रीमती शारदा देवी एवं श्रीमती शालिनी देवी को पुरस्कृत किया गया। इस अवसर पर संस्थान में चल रही अनुसूचित जाति उपयोजना के अन्तर्गत अल्मोड़ा व बागेश्वर जनपद के विभिन्न गांवों से आए कृषकों को एग्रीकैनन, वी एल कुरमुला ट्रैप, वी एल मंडुआ थ्रैशर, वी एल पॉलीटनल एवं पावर वीडर तथा जनजातीय उपयोजना के अर्न्तगत पावर वीडर ग्राम धनपौ, लखवाड़ कालसी ब्लॉक, देहरादून को वितरण किया गया। मुख्य अतिथि एवं विशिष्ट अतिथियों द्वारा संस्थान की प्रजातियों नामतः वी एल त्रिपोषी, वी एल सुपोषिता, वी एल मधुरिमा, वी.एल. मडुवा 410 का लोकार्पण किया गया। इसके अतिरिक्त संस्थान के प्रकाशनों नामत: पर्वतीय कृषि दर्पण, पर्वतीय क्षेत्रों की महत्वपूर्ण फसलों की उन्नत किस्मों हेतु प्रबंधन कृषि पद्धतियाँ, उत्तराखंड की पारंपरिक फसल भट (काली सोयाबीन) के मूल्य वर्धित उत्पाद एवं पर्वतीय क्षेत्रों में दलहनी मटर की वैज्ञानिक खेती का विमोचन किया गया।

किसान मेले में आयोजित प्रदर्शनी में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अनेक संस्थानों, कृषि विज्ञान केन्द्रों एवं सरकारी तथा गैर सरकारी संस्थानों द्वारा प्रतिभाग किया गया एवं लगभग 40 प्रदर्शनियाँ लगायी गयी। इस अवसर पर विभिन्न संस्थानों एवं विभागों के वैज्ञानिक एवं अधिकारीगणों के अतिरिक्त 10 जिलों से आये लगभग 1129 कृषक भी उपस्थित थे। मेले में आयोजित कृषक गोष्ठी में पर्वतीय कृषि से सम्बन्धित विभिन्न पहलुओं पर महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की गयी साथ ही कृषकों की विभिन्न समस्याओं का कृषि वैज्ञानिकों द्वारा त्वरित समाधान किया गया। विभिन्न कृषकों द्वारा अपने अनुभव साझा किये गये। कृषि विज्ञान मेले में कृषक गोष्ठी का संचालन डॉ. कामिनी बिष्ट, वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं कार्यक्रम का संचालन डा. अनुराधा भारतीय तथा श्रीमती निधि सिंह एवं धन्यवाद प्रस्ताव डा. निर्मल कुमार हेडाऊ, प्रभागाध्यक्ष, फसल सुधार द्वारा किया गया।

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