आज वह सुबह से अलसाया पड़ा है। खुशी और उत्सुकता दोनों जैसे कहीं खो चुकी हैं। शाम 7:30 बजे उसने बैड छोड़ा, 8:20 पर नाश्ता और फिर चाय पी। बाहर बारिश हो रही है—जुलाई का दूसरा दिन। वह चाहता है कि बारिश से मानसून अच्छी तरह आए, लगातार तीन दिन एक ठंडक के साथ, ताकि धरती अपनी सारी गर्मी बाहर निकाल सके। वैसे भी गर्मी डराती है, सर्दी सिकुड़ती है और बरसात अलसाती है। नाश्ते के बाद फिर पड़े रहने का मन करता है।
वैसे भी वह तीन स्तरों से जीवन जी रहा है—देह का जीवन, मन का जीवन और विचारों का जीवन। एक चौथा जीवन भी है—सिद्धान्तों का जीवन, जिसे उसने अपने पिता से लिया है। वह सिद्धान्तों के साथ समझौता नहीं करता। वह निरंतर इनके अनुपालन में जीवन भर सहबद्ध (जुड़ा) रहा, परन्तु अब कमज़ोर पड़ गया है।
वे सबकी सुनते है, परंतु उन्हें विचार नज़र नहीं आते। वे निर्णय भावुकता में लेता है। वे अपनी माँ से दूर रहा क्योंकि बचपन में ही उन्हें खो दिया था। वे अपनी माँ के बहुत करीब रहा, जब 70 की अवस्था में उनकी माँ भी चल बसीं। पिता की भावुकता की वजह से वे यथार्थ और माया में अंतर नहीं कर पाते थे। आज वह घिरे हैं अपनों की जादूगरी में, सबके मन में लालच है पर वे समझ नहीं पाते। या समझते भी हैं तो निर्णय नहीं ले पाते, क्योंकि मन कमज़ोर है—क्योंकि परिस्थितियों का विश्लेषण करना नहीं सीखा है।
जीवन ऐसा नहीं है जैसा वह देखता है। वह सब कुछ गलत होते हुए देख रहा है। महीने का प्रारंभ है, सबको माँगे भटकाएँगी पर कौन समझ पाएगा? वह जीवन को ऐसे ही गुज़ारना चाहते हैं माँ के बगैर… एक अकेलेपन में।
वह अलसाया पड़ा है क्योंकि बरसात है। वह सोच रहा है—प्रेम भी छलावा है, दोस्ती भी विश्वास के लायक नहीं। घर-परिवार के लोग भी स्वार्थवश लूटने-खसोटने पर लगे हैं। सब कुछ माया है, ऐसा प्रतीत होता है। बुद्ध के ‘चार आर्य सत्य’ नज़र आते हैं कि:
दुःख है।
दुःख का कारण है।
दुःख का निवारण है।
दुःख निवारण का मार्ग (अष्टांगिक मार्ग) है।
पहला कारण—जन्म दुःख है, बीमारी दुःख है, वृद्धावस्था दुःख है और अंत में मृत्यु दुःख है। शील, समाधि और प्रज्ञा द्वारा ही आर्य अष्टांगिक मार्ग पर चलकर मुक्ति पाई जा सकती है।
परन्तु वह अभी देह-प्रपंच में ही फंसा है। देह, संवेदनाएं, विचार और मुक्ति… जीवन जीने के लिए किसी प्रकार से सिद्ध हो सकता है—खल और सुगम। बुद्ध ने स्वयं कहा है: “किसी गलत व्यक्ति के साथ चलने से अच्छा है कि अकेले ही चला जाए।”
बुद्धं शरणं गच्छामि — स्वयं के साथ चलो, सत्य के साथ चलो।
धम्मं शरणं गच्छामि — धर्म के साथ चलो, प्रकृति के नियमों के साथ चलो।
संघं शरणं गच्छामि — एक जैसे समूह के साथ चलो जो सत्य की ओर अग्रसर हो रहे हों।
परन्तु देह फिर भी आती है, देह से मुक्ति नहीं है। प्रकृति में हर मादा, नर को आकर्षित कर रही है। प्रकृति चाहती है कि केवल जीवन की उत्पत्ति और निरंतरता बनी रहे। डार्विन ने जीवन का विकासवाद तो खोजा, परन्तु मन का विकासवाद अभी अधूरा है। भौतिकवादी विकासवाद के बावजूद चारों ओर दुःख ही दुःख है। मन का विकासवाद अधूरा है, आज उसमें चिंतन का अभाव है। दूरी कम हुई है, तो मन में चंचलता बढ़ी है।
वह शिप्रा की देह को टटोल रहा है जो उसके मन में बसी है। वह गलती कर चुकी है, दुनिया की चकाचौंध ने उसे बहका दिया है। वह उसे खो चुकी है, जो उसकी देह-गंध से चौबीसों घंटे जूझ रहा था। आज वह उसी के सांनिध्य का एक पल चाहती है, जो कि उसे नसीब नहीं है।
झूठ के जिस मोहपाश में वह बंधी थी, उसके चटकीले रंग उतर चुके हैं। सब कुछ बासी और बेबाक हो चुका है। जिस चाशनी में उसने मुँह डुबोया था, वह खट्टी और कड़वी हो चुकी है। हर चमकती चीज़ सोना नहीं होती, हर दिखावा प्रेम नहीं होता—उसने एक बड़ा धोखा खाया है। हीरा खोकर पत्थर से उसके हाथ छिल गए हैं।
कुछ दिनों पहले जिससे उसकी आँखें चौंधिया रही थीं, वही आज उसके दिल को लहूलुहान कर रहा है। वह आज उसकी फड़फड़ाती देह को अपने करीब पा रहा है, वह लिपटी हुई है। बरसात के इस मौसम में छोड़ना नहीं चाहती, बार-बार पश्चाताप कर रही है। हज़ारों चुंबन उसके चेहरे और देह पर देना चाहती है। जितना दर्द दिया है उतना ही आकर्षण है। उसकी भुजाएं उसके वक्ष से लिपटी हैं, उसके होंठ उसके होंठों को ढूँढ रहे हैं।
उसकी जाँघों और पिंडलियों ने सर्प की तरह उसे लपेट लिया है। वह गलती से भी उससे अलग नहीं होना चाहती है। उसे डर है कि आज भी दुश्मन (दुनिया) उन दोनों को एक होते नहीं देखना चाहते।
परन्तु यह सब उसका भ्रम है, एक ख्वाब है, एक सपना है। पर यह ख्वाब शायद हकीकत से भी ज़्यादा खूबसूरत है। शायद किसी को पा लेना लक्ष्य नहीं, अपितु लगातार कोशिश करते रहने में ही ज़्यादा आनंद है। वह लेटे रहते हुए ऐसा ही सोच रहा है।
परन्तु हकीकत यह है कि उसे खोने का उसे बहुत गम है। परन्तु उसका अहम् और इसका अभिमान उसको उसकी ओर लौटने से रोक रहा है। उसकी देह-गंध से तो वह चौबीसों घंटे परेशान है, जो मृग की कस्तूरी की तरह उसमें बसती थी। आज वह अपने ही गिरेबान में मृग-मरीचिका की तरह अनवरत खोज रही है।
परन्तु वक्त जा चुका है। यह पीड़ा तो उसे जीवन भर झेलनी पड़ेगी—”सामने से मुँह मोड़कर वह अँधेरी गली की तरफ क्यों गई?”—इसका पछतावा उसे ज़िन्दगी भर रहेगा। वह न चाहते हुए भी उसकी देह-गंध से जीवन भर मुक्त नहीं हो सकती। यही उसके वर्तमान की त्रासदी है।
