भारतीय अक्षय ऊर्जा दिवस – प्रकृति के साथ संतुलित विकास की ओर भारत का संकल्प

भारतीय अक्षय ऊर्जा दिवस – प्रकृति के साथ संतुलित विकास की ओर भारत का संकल्प
💥पृथ्वी से संसाधन लें, लेकिन पृथ्वी को लौटाने का संकल्प भी निभाएँ
🌳पेड़ लगाएँ, भविष्य बचाएँ
🙏🏻स्वामी चिदानन्द सरस्वती
ऋषिकेश, 20 अगस्त। भारतीय अक्षय ऊर्जा दिवस हमें उस मूल भारतीय दृष्टि का स्मरण कराती है, जिसमें प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार और हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रही है। सूर्य, वायु, जल, पृथ्वी और वनस्पतियों के प्रति कृतज्ञता भारतीय जीवन-दर्शन का अंग है। आज जब जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, ऊर्जा संकट और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ता दबाव पूरी मानवता के सामने गंभीर चुनौती बन चुके हैं, तब अक्षय ऊर्जा की ओर बढ़ना केवल तकनीकी आवश्यकता नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ संतुलित जीवन की पुनर्स्थापना का संकल्प भी है।
आज हमारी जीवनशैली ऊर्जा पर अत्यधिक निर्भर हो चुकी है। घरों से लेकर उद्योगों, परिवहन, कृषि और डिजिटल तकनीक तक हर क्षेत्र में ऊर्जा की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है। लंबे समय तक कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता ने आर्थिक विकास को गति तो दी, लेकिन इसके साथ वायु प्रदूषण, कार्बन उत्सर्जन, ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियाँ भी बढ़ीं।
ऐसे समय में अक्षय ऊर्जा सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जलविद्युत, जैव ऊर्जा और अन्य स्वच्छ ऊर्जा स्रोत, भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार बनते हैं। अक्षय ऊर्जा के स्रोत प्रकृति में लगातार उपलब्ध होते हैं और इनके विवेकपूर्ण उपयोग से जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम की जा सकती है। इसलिए अक्षय ऊर्जा दिवस हमें संदेश देता है कि हम अपनी ऊर्जा जरूरतों को प्रकृति के साथ संघर्ष के बजाय प्रकृति के सहयोग से कैसे पूरा कर सकते हैं?
पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि भारतीय सनातन जीवन-दृष्टि में प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व कोई नया विचार नहीं था। हमारे ऋषियों ने सूर्य को ऊर्जा और जीवन का आधार माना। वैदिक परंपरा में सूर्य, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त की गई। भारतीय जीवन पद्धति स्थानीय संसाधनों, प्राकृतिक चक्रों और आवश्यकता-आधारित उपभोग पर अधिक आधारित थी। उस समय ऊर्जा का उपयोग आज की तरह बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन, अत्यधिक उपभोग और विशाल परिवहन तंत्र के लिए नहीं होता था। प्रकृति से जितना लिया जाता था, उसके साथ संतुलन बनाए रखने की चेतना जीवन का हिस्सा थी।
‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः’ जैसी भारतीय भावना हमारे और पृथ्वी के संबंध को स्पष्ट करती है, पृथ्वी हमारी माता है और हम उसकी संतानें हैं। इसलिए प्रकृति का संरक्षण कोई अलग से किया जाने वाला अभियान नहीं, बल्कि जीवन का स्वाभाविक अनुशासन था।
आज आवश्यकता इस प्राचीन चेतना को आधुनिक विज्ञान और तकनीक के साथ जोड़ने की है। आज भारत तेजी से विकसित हो रहा है। करोड़ों लोगों की ऊर्जा जरूरतें, बढ़ते शहर, उद्योग, परिवहन और डिजिटल अर्थव्यवस्था ऊर्जा की मांग को निरंतर बढ़ा रहे हैं। ऐसे समय में अक्षय ऊर्जा भारत के लिए पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक आत्मनिर्भरता और भविष्य की पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य का माध्यम बन सकती है।
सौर ऊर्जा विशेष रूप से भारत के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश के अनेक हिस्सों में वर्ष के बड़े भाग में पर्याप्त सूर्यप्रकाश उपलब्ध रहता है। घरों, संस्थानों, आश्रमों, विद्यालयों और उद्योगों में रूफटॉप सोलर जैसी पहल ऊर्जा की जरूरतों को अधिक टिकाऊ बना सकती हैं।
अक्षय ऊर्जा का विस्तार रोजगार के नए अवसर भी पैदा कर सकता है, सोलर पैनल निर्माण, स्थापना, रखरखाव, ऊर्जा भंडारण, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और हरित तकनीक जैसे क्षेत्रों में युवाओं के लिए नए अवसर विकसित हो रहे हैं।
घर या संस्थान की परिस्थितियों के अनुसार सौर ऊर्जा को अपनाना, ऊर्जा-कुशल उपकरणों का उपयोग करना, अनावश्यक लाइट और पंखे बंद रखना तथा बिजली की बर्बादी रोकना सरल लेकिन प्रभावी कदम हैं।
जहाँ संभव हो, सार्वजनिक परिवहन, साइकिल और पैदल चलने को प्राथमिकता देना तथा इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर बढ़ना भी स्वच्छ ऊर्जा व्यवस्था को मजबूत कर सकता है।
आज आवश्यकता है कि सूर्य से ऊर्जा लें, लेकिन सूर्य के प्रति कृतज्ञता भी रखें, जल का उपयोग करें, लेकिन जल का संरक्षण भी करें, पृथ्वी से संसाधन लें, लेकिन पृथ्वी को लौटाने का संकल्प भी निभाएँ, पेड़ लगाएँ, भविष्य बचाएँ।

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