वैज्ञानिक अभियानों, कठिन परिस्थितियों और संचार व्यवस्था पर विशेष व्याख्यान
देहरादून। तीन दिवसीय ‘किताब कौतुक मेले’ के दूसरे दिन दुन लाइब्रेरी के सभागार में “अंटार्कटिका: जैसा मैंने देखा” विषय पर एक विशेष परिचर्चा का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का संचालन सूत्रधार प्रो. पंचोली द्वारा कुशलतापूर्वक किया गया।
कार्यक्रम में मुख्य वक्ता एवं भारतीय अंटार्कटिक दल के सदस्य श्री घनश्याम सिंह जी ने वर्तमान समय में अंटार्कटिका के महत्व पर अपने विचार रखे। उन्होंने धरती पर बदलते मौसम, पिघलते ग्लेशियर, बढ़ते तापमान, लाखों वर्षों से दरकते पहाड़, प्राकृतिक वातावरण में असंतुलन, वायु व जल प्रदूषण, नई संक्रामक बीमारियों और जीवनशैली जनित रोगों पर चिंता व्यक्त की। इसके साथ ही उन्होंने अंटार्कटिका के भूगोल, इतिहास और वहाँ जीवन के विकास पर विस्तार से चर्चा की।
श्री घनश्याम सिंह ने वर्ष 1981 में पहली बार ‘राष्ट्रीय समुद्री संस्थान गोवा’ से अंटार्कटिका तक पहुँचे भारतीय वैज्ञानिक अभियान दल के प्रारंभ से लेकर आगे के सफर को रेखांकित किया: 1983: पहले वैज्ञानिक केंद्र ‘दक्षिण गंगोत्री’ का निर्माण हुआ। वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. हर्षगुप्ता के नेतृत्व में पहले शीतकालीन प्रवास का अनुभव रहा। 1989: दूसरे शोध केंद्र ‘मैत्री’ का निर्माण किया गया। तीसरा केंद्र: तीसरे शोध केंद्र ‘भारती’ के संबंध में भी चर्चा की गई।
उन्होंने ‘मैत्री’ के शीतकालीन प्रवास के दौरान आई आकस्मिक स्वास्थ्य समस्याओं का उल्लेख किया। इस दौरान उन्होंने कविता लेखन और अपनी पहली पुस्तक “मुसाफिर काव्य संग्रह” से अपनी पंक्तियाँ सुनाईं:
“आग नहीं लगती पानी में, हमने बर्फ के तूफानों में सुलगते हुए दिलों को देखा है।”
श्री भगवती प्रसाद जी (संचार अधिकारी): सैन्य संस्थान में लंबे समय तक सेवा देने वाले संचार अधिकारी भगवती प्रसाद जी ने अंटार्कटिक अभियान दल से जुड़ने के अपने अनुभवों को साझा किया। वे तीन बार ‘मैत्री’ और दो बार ‘भारती’ केंद्र में संचार अधिकारी के रूप में अपने 6 वर्षों के संस्मरण दर्शकों के सामने रखे। उन्होंने इस बात पर मार्गदर्शन किया कि छात्र अपने जीवन में अंटार्कटिका को कैसे समझ सकते हैं और इस अभियान दल से कैसे जुड़ सकते हैं। श्री नवीन रामोला जी (सर्वेक्षण विभाग): अभियान दल के सदस्य रहे नवीन रामोला जी ने अपने विभाग से भारतीय अंटार्कटिक वैज्ञानिक केंद्रों के निर्माण से पहले के सर्वेक्षण की बारीकियों को समझाया। साथ ही, उन्होंने वर्तमान में भारत के चौथे अंटार्कटिक केंद्र के निर्माण से जुड़ी भावी योजनाओं के बारे में जनसमूह को अवगत कराया।
















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